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विक्रमजोत क्षेत्र में ‘कच्ची’ का काला साम्राज्य, खाकी की चुप्पी या ‘सुविधा शुल्क’ का खेल?

सरयू की लहरों पर 'जहर' का कारोबार: आखिर किसके वरदहस्त से फल-फूल रहा माफिया नेटवर्क?

अजीत मिश्रा (खोजी)

🚨सरयू के कछार में सुलगती मौत की भट्ठियां, क्या ‘कमीशन’ के दम पर मौन है विक्रमजोत पुलिस?

वृहस्पतिवार 22 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती ।। जिले के विक्रमजोत चौकी क्षेत्र में इन दिनों कानून का इकबाल नहीं, बल्कि शराब माफियाओं का सिक्का चल रहा है। सरयू नदी के किनारे बसे दुर्गम इलाकों और मांझा क्षेत्र को माफियाओं ने सुरक्षित पनाहगाह बना लिया है। यहाँ कच्ची शराब बनाना अब कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है। लेकिन सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि इस अवैध नेटवर्क की जड़ें स्थानीय पुलिस चौकी और आबकारी विभाग के ‘कथित संरक्षण’ से जुड़ी हुई हैं।

🔥भ्रष्टाचार की ‘भट्ठी’ पर उबलता सिस्टम

क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि आबकारी विभाग और चौकी प्रभारी के पास अवैध शराब के अड्डों की पूरी लिस्ट मौजूद है। लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल वही पन्ने पलटे जाते हैं, जहां से ‘सुविधा शुल्क’ पहुंचने में देरी होती है। आरोप है कि हर महीने एक निश्चित नजराना सिस्टम के कारिंदों तक पहुंचता है, जिसके बदले माफियाओं को अभयदान मिला हुआ है।

🔥छतौना मांझा: कार्रवाई या महज दिखावा?

हाल ही में छतौना मांझा में हुई छापेमारी को स्थानीय लोग ‘नूराकुश्ती’ करार दे रहे हैं। 550 किलो लहन नष्ट करना और अज्ञात पर मुकदमा दर्ज करना विभाग की पुरानी पटकथा का हिस्सा बन चुका है।

सवाल 1: जब भारी मात्रा में उपकरण और लहन बरामद हुआ, तो मौके से कोई गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई?

सवाल 2: अज्ञात के खिलाफ मुकदमा लिखकर क्या विभाग असली माफियाओं को बचाने का रास्ता साफ कर रहा है?

सवाल 3: आखिर क्यों पुलिस की दबिश से पहले ही भट्ठियां ठंडी हो जाती हैं और आरोपी फरार हो जाते हैं?

🔥नेटवर्क: दर्जनों गांव, सैकड़ों भट्ठियां

विक्रमजोत क्षेत्र के एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों गांव इस समय अवैध शराब के निर्माण की चपेट में हैं। नदी के किनारे घनी झाड़ियों और दुर्गम रास्तों का फायदा उठाकर प्रशासन की नाक के नीचे मिनी फैक्ट्रियां चल रही हैं। सूत्रों की मानें तो यहाँ से तैयार शराब न केवल बस्ती, बल्कि पड़ोसी जिलों में भी सप्लाई की जा रही है।

सरयू नदी की लहरों के किनारे इन दिनों पानी नहीं, बल्कि अवैध शराब का ‘नहर’ बह रहा है। विक्रमजोत पुलिस चौकी क्षेत्र अवैध कच्ची शराब के निर्माण और बिक्री का नया गढ़ बन चुका है। आलम यह है कि दर्जनों गांवों में मिनी शराब फैक्ट्रियां धड़ल्ले से चल रही हैं, लेकिन प्रशासन की आंखें तभी खुलती हैं जब ऊपर से कोई बड़ा दबाव आता है। वरना, आबकारी विभाग और स्थानीय पुलिस की ‘मौन स्वीकृति’ इस अवैध कारोबार को खाद-पानी दे रही है।

🔥दबिश के नाम पर सिर्फ ‘खानापूर्ति’

हाल ही में आबकारी टीम ने छतौना मांझा क्षेत्र में एक तथाकथित “प्रभावी” छापेमारी की। विभाग का दावा है कि सरयू किनारे से लगभग 550 किलो लहन नष्ट किया गया और भारी मात्रा में शराब बनाने के उपकरण बरामद किए गए। तीन अज्ञात लोगों के खिलाफ आबकारी अधिनियम के तहत मुकदमा भी दर्ज कर लिया गया। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि हर बार छापेमारी के दौरान आरोपी फरार कैसे हो जाते हैं? क्या दबिश से पहले ही उन तक सूचना पहुंच जाती है?

🔥सुविधा शुल्क और संरक्षण के गंभीर आरोप

क्षेत्र में चर्चा आम है कि आबकारी विभाग और चौकी प्रभारी की मेहरबानी के बिना यह नेटवर्क फल-फूल नहीं सकता। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ‘सुविधा शुल्क’ के एवज में इस जहरीले कारोबार को संरक्षण दिया जा रहा है। जब भी मीडिया या उच्चाधिकारियों का दबाव बढ़ता है, तो सिस्टम हरकत में आने का नाटक करता है। एक ही गांव में बार-बार दबिश देकर आंकड़ों का पेट तो भर लिया जाता है, लेकिन बाकी गांवों में चल रही अवैध भट्ठियों की तरफ पुलिस देखना भी मुनासिब नहीं समझती।

🔥सवालों के घेरे में सिस्टम

आखिर प्रशासन की नजर उन दर्जनों गांवों तक क्यों नहीं पहुंच रही, जहां घर-घर में कच्ची शराब उतारी जा रही है? यह केवल आबकारी विभाग का एक्शन है या फिर ‘सेटिंग का खेल’? सरयू के दुर्गम रास्तों का फायदा उठाकर माफिया चांदी काट रहे हैं और पुलिस केवल लहन नष्ट करने की फोटो खिंचवाकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर लेती है।

🔥अधिकारी मौन, जनता में आक्रोश

ऊपर से दबाव पड़ने पर प्रशासन कुछ घंटों के लिए सक्रियता दिखाता है, फोटो खिंचवाता है और फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है। जनता पूछ रही है कि क्या जिला प्रशासन किसी बड़े हादसे या जहरीली शराब से होने वाली मौतों का इंतजार कर रहा है?

कड़वा सच: “दबिश के नाम पर खानापूर्ति और सेटिंग के नाम पर संरक्षण” — यही विक्रमजोत क्षेत्र में आबकारी विभाग की नई कार्यशैली बन गई है।

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